किसी भी प्रशासनिक अधिकारी के लिए उसकी पहली पोस्टिंग कई मायनों में अहम होती है। आख़िर यह सेवा है क्या – पहली बार इसके सम्बन्ध में स्वयं की आदर्शवादी उपधारणाएँ व प्रकल्पनाएँ- इसकी हक़ीकत की पहेलियों से रूबरू होती है। तंत्र, समय व समाज के निरंतर चक्र से उपजी इसकी कुछ वीभत्स, तो कुछ हास्यास्पद कृतियों से गुत्थम – गुत्थी करती हैं, व दांव पेंच के चैस बोर्ड पर काले और सफ़ेद से इतर सलेटी रंग भी पहली बार यकायक दीखने लगता है।
कागज़ और फाइल के साम्राज्य में पहली बार दख़ल भी पाते हैं, और इसी खेल में प्यादों को राजाओं को परास्त भी करते देखते हैं। ड्राइंग रूम की बैठकों व चाय के ठेलों पर बके गए विचारों, और ज़मीनी परिणामों के बीच की संकरी, अनिष्ट, दुष्कर, गुंडों से भरी गलियों से पहली बार गुज़रते हैं – और इन्ही गलियों से गुज़रते हुए स्वयं की शुचिता को बनाये रखने के एहतियात भी पहली बार सीखते हैं। पहली बार सरकार, समाज व सेवा के आर्थिक, सामाजिक, व सांकेतिक क्रमों व अनुक्रमों को करीब से जानते हैं, और उसी अनुपात में उनकी खींचा तानियों से न्याय की परिभाषा रूपी कठपुतलियों के संचालन के नियम सीखते है।
साथ ही पहली बार- हल्का ही क्यों न हो- सत्ता का खुमार चढ़ता है। झीनी ही क्यों नहीं – एक सुविधाओं की चादर का सेक महसूस होता है। हिचकिचाता ही सही, आपके हर सही गलत पर हाँ में हाँ मिलाने वाला, एक संगीतमय कलरव का चस्का कानों को लगता है। धीरे धीरे और परतों से ढके जाने वाले इस प्रशासनिक सेवा के बुलबुले की पहली परत, और एक अफ़सर के रूप में उसकी चरित्र की इमारत की नींव का निर्माण करती है उसकी पहली पोस्टिंग। और इस पहले रंगमंच के रूप में देवरिया की देव नगरी मेरे लिए हमेशा ख़ास रहेगी।
पश्चिम उत्तर प्रदेश में जन्मी, दिल्ली में पली बढ़ी, इतिहास की विद्यार्थी के लिए देवरिया ज़िला – सांस्कृतिक बोध से लबालब पूर्वांचल का पहला अनुभव था। ये सफ़र शुरू हुआ कछार के इलाके- राप्ती के किनारे, रुद्रपुर में – जहाँ 5 महीने के छोटे अंतराल में ही बहुत कुछ सीखने को मिला। उस शहर ने मुझे जैसे क़रीबन नास्तिकता की कग़ार पर खड़े व्यक्ति को भी दुग्धेश्वर नाथ मंदिर से संचालित उस शहर की सकारात्मक प्राण शक्ति को महसूस करने को विवश कर दिया। और लोगों का इस छोटे अंतराल में बहुत प्रेम मिला।उस के बाद फिर करीब डेढ़ वर्ष देवरिया सदर में- जो एक नयी चुनौती थी- यहां बहुत कुछ सीखा, पुरानी सीखें भूलीं। कुछ परेशानियां आयीं – पर यहां के भूजे और छोटे कुल्हड़ की चाय की चर्चाएं, किसी न किसी माध्यम से उनका हल भी साथ लाईं।
कुंवर नारायण बनारस के लिए लिखते हैं – ‘लगता है एक भीषण दुर्व्यवस्था हमारी रक्षा कर रही है। ‘ कई बार इस गत वर्ष में कुछ क्षण रुक कर जब भी अपने आस पास देखा है – कभी सुबह सुबह तहसील के कोलाहल में, कभी कचहरी में, कभी किसी खेत की मेड पर खड़े, तो कभी किसी धरने के बीचो बीच – देवरिया के परिप्रेक्ष में इन शब्दों में सच्चाई पायी है। देवरिया अपनी लय में लीन शहर है- अतीत के धरोहर को समेटे, अपनी मस्ती में सराबोर, अपने नियमों से संचालित, अपने अधिकारों के प्रति सजग, अपनी मेहमाननवाज़ी में उदार, अपनी महत्त्वाकांक्षाओं में संयमित पर अपने इरादों में अड़ियल और उसूलों का स्वाभिमानी। कुछ समय के लिए ही सही, इस जनपद की अस्थायी नागरिकता ग्रहण करने का निमंत्रण प्राप्त हुआ । जो भूजे के प्रेम सहित कुछ स्थायी चिन्ह मुझ पर ज़रूर छोड़ गया।
किसी भी प्रशासनिक अधिकारी का कार्यकाल किसी भी पद पर अल्प होता है- प्रशासन, तंत्र, व्यवस्थाओं, समाजों व शहरों का निज प्रवाह होता है , एक सदियों से चलता आया, स्वयं रूपांतरित होता व्याकरण होता है – जो किसी व्यक्ति विशेष से संचालित नहीं हो सकता। हम बस कुछ समय अंतराल के लिए- अथक कूद -फांद से इन विभिन्न variables के गणित से संचालित निज प्रवाह में कुछ लहरें ( बड़ी या छोटी) उठा सकते हैं- बस उम्मीद करती हूँ कि वह लहरें, अल्प व छोटी ही क्यों न हों- सही गंतव्यों तक पहुंची होंगी।
2 responses to “कुछ समय के लिए देवरिया”
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♥️♥️🪭
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