उच्च न्यायालय, इलाहाबाद, भारत की हर संस्थागत इकाई की तरह, अपने आप में एक आत्मनिर्भर , आत्मसमाहित अर्थव्यवस्था है, जो न्यायालय के परिसर की 2 km की त्रिज्या में सुबह 8-9 बजे की उथल पुथल में जमाई जाती है और रात को 8-9 बजे बटोर कर पान की पीकों और election के पर्चों सहित अपने अस्तित्व के अन्य कई स्थायी – अस्थायी चिह्न छोड़कर सोने अपने घर चली जाती है ।

इस अर्थव्यवस्था के भूगोल को समझने के लिए इसका भौतिक विवेचन आवश्यक है। उच्च न्यायालय माने सिर्फ वह एक इमारत या इमारतें नहीं जहां पर काले कोट धारी वकीलों और न्यायाधीशों का दखल है- इसके ठीक बाहर की दुनिया भी इस परिभाषा का एक अभिन्न अंग है। इस विवेचना के चलते लेखक contempt of court की निहत्थी शिकार न बन जाए, महज़ इस कारण से न्यायालय और उसकी अनेक इमारतों की व्यापक आतंरिक अर्थव्यवस्था पर टिप्पणी न करते हुए, उसके 200m की त्रिज्या में पनपते ecosystem के वर्णन पर अपना ध्यान केंद्रित करते हैं।

इस चक्रव्यूह में बाहर से अंदर की तरफ आते हुए सबसे पहले मिलता है- एक से एक सटी हुई सफ़ेद काले स्टीकर लगी मोटरसिकलों और गाड़ियों का गणतंत्र – सब अपनी निजी स्वाधीनता दिखाने को इतनी आतुर- कि हर दो पहिया और चार पहिया तो छोड़िये, हर पहिये ने भी जैसे सामानांतर ने खड़े होने की कसम खा रखी हो। पर चाहे ये गणतंत्र कितना भी अव्यवस्थित क्यों न हो, इसके निवासी हर पहिये की स्वतंत्रता और यथास्थिति के सिद्धांत को नमस्कार करते हुए, कहीं पेट अंदर दबा कर तो कहीं किसी पहिये को घुमाकर, अपना रास्ता निकाल ही लेते है।

ये चक्रव्यूह अन्य चक्रव्यूहों से कुछ अलग भी है- कि लोगों का प्रवाह दोनों दिशाओं में एक दूसरे के वेग में अधिक ख़लल न देते हुए निरंतर चलता है- मानो एक शतरंज के खेल में काले और सफ़ेद प्यादे दो विपरीत दिशाओं से एक दूसरे को आदाब अर्ज़ करते हुए आगे बढ़ रहे हों।

इस पहले चक्र को चीरते हुए जब आदमी कुछ और आगे बढ़ता है- तो इस दुनिया में दख़ल पाने हेतु आवश्यक पोशाक़ और लम्बी लड़ाई में डटे रहने के लिए कुछ ज़रूरी हथियार- दोनों ओर छोटे बड़े ठेलों और दुकानों पर per hour , per day और forever बेसिस पर मुहैय्या कराये जा सकते हैं। आपको यहां वो सब कुछ मिल जायेगा जो चंद मिनटों में आपको वक़ील, मुवक्क़िल और मुंसिफ़ का दर्जा देने के लिए ज़रूरी हो। आप 5 मिनट में भाड़े पर लिए गए कोट और complimentary कॉलर पहन अधिवक्ता बन सकते हैं और पर्सनल affidavit पर लगी लाल शर्ट पहने पासपोर्ट साइज़ फोटो को कुछ रकम अदा करने पर निपुण कंप्यूटर ऑपरेटर द्वारा न्यायालय उपयुक्त पोशाक़ भी पहनवा सकते हैं। आपको यहाँ की अखबार की तहों और ईंटों के टुकड़ों से संतुलित ३ बाई 2 मेज़ों पर राजस्व, आपराधिक व सिविल कानून की सभी किताबों के नवीनतम संस्करण के साथ साथ हर रंग के कलम, कॉपी, फाइल, फाइल कवर और काम आने वाली हर स्टेशनरी की सामग्री इस 50m के घेरे में आँखों के कोनों से दिख जाएगी।

सभी आवश्यक हथियारों और स्थिति अनुकूल परिधानों से लैस घुसते हैं तीसरे चक्र में- इन अस्थायी ठेलों के ठीक पीछे दिखाई देते हैं कुछ पक्की ईंटों के छोटे छोटे दड़बे और कहीं टीन की नीचे बिछी मेज़ों और बेंचों के ‘चैम्बर’। जहां अभी तक अमूर्त शिकायतें, घटनाएं और खानदानी रंजिशें- मुक़दमे के कागज़ों का मूर्त रूप लेती हैं- जिन्हे जुबां से कागज़ पर पहुंचाने का रेट – वक़ील के अनुभव और कोर्ट में पहुँच के दावों से निर्धारित किया जाता है। यहां पाए जाने वाले वकीलों/ टाइपिस्ट की उँगलियों ने उत्तर प्रदेश के विभिन्न कोनों में घटित न जाने कितनी सच्ची- झूठी होनियों, अनहोनियों, लिखित और मुँह बोली कहानियों का तर्जुमा गलत सलत अंग्रेजी में पूर्ण आत्मविश्वास से किया होगा। यहाँ कागज़ सिर्फ अपनी कहानी लेकर नहीं चलते; उनके साथ पैसे, पहुँच और अनुभव भी चलते हैं। कुछ कागज़ लम्बा सफर तय कर लेते हैं, कुछ रास्ते में ही दम तोड़ देते हैं।

सही पोशाक़, सही कागज़ और सही शब्द ढूंढ़ते ढूंढ़ते और टेढ़े पहियों और लोगों से बचते बचाते इस चक्रव्यूह में आया मेहमान अब तक कुछ थका हुआ महसूस करने लगता है। तो ठीक इस समय एक ओर फ्रूट चाट तो एक ओर कई बार पके तेल में तल रही भटूरे और कचोरी की कढ़ाई के ठीक बीचोबीच एक बेंच आपको दीखती है। एक फटे तिरपाल और टेढ़ी बेंच पर मीठी चटनी में डूबे समोसे के टुकड़े को मौसम्बी के जूस सहित गटक कर शरीर में फिर कुछ जज़्बा दौड़ता है।

पर शाम हो चुकी है। यही दुनिया धीरे धीरे अपने पहियों पर वापिस चढ़ रही है। ठेले सिमटते हैं, टीन की छतें उतरती हैं, टाइपराइटर बंद होते हैं और काले कोट घरों की तरफ लौट जाते हैं। सड़क पर बस कुछ पान की पीक, फटे कागज़ और दिन भर की आवाज़ों की हलकी सी गूँज बचती है। अगली सुबह फिर बसेगी यही दुनिया—कुछ नए चेहरों, कुछ पुराने मुकदमों और जूस के उन्हीं घूँटों के साथ। मौसम्बी का आखिरी घूंट गले से उतारते ही किसी को फिर लगेगा कि इस चक्रव्यूह को भेदा जा सकता है। चक्रव्यूहों की यही माया है।

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कागज़, कोट और चक्रव्यूह

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