कविता

सिर्फ प्रेम का इज़हार नहीं, सिर्फ वसंत की फुहार नहीं,
सिर्फ वर्षा का झंकार नहीं, सिर्फ अलंकारों का अंबार नही।

यह एकांत का उपहार भी है, यह उम्र का उधार भी है,
सन्नाटे का संहार भी है, शब्दों का व्यापार भी है।

एक व्याकुल पुकार, सिहरता अंगार भी है,
भाव, आवेग, आवेशों को द्वार
आंसुओं का आकार, अंतरद्वंद की पुकार भी है।

कविता सिर्फ सौंदर्य की उपमा नहीं, कुरूपता की नग्नता भी है।
कविता
महज़ अभिव्यक्ति की आज़ादी नहीं, अभिव्यक्ति की विवशता भी है।

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One response to “कविता”

  1. sagarsahu562003 अवतार

    तुम ठीक कहते हो।कविता केवल कहना नहीं होती,वह सह लेना भी होती है।

    जहाँ शब्द रुक जाते हैं,वहीं कविता चुपचाप बैठ जाती है,माथे पर हाथ रखकर पूछती है —“दर्द बहुत है क्या?”

    वह प्रेम का प्रदर्शन नहीं,प्रेम का निर्वचन है।करुणा की पुकार नहीं,करुणा की साधना है।

    कविता वह दीप हैजो उजाले के लिए नहीं,अँधेरे के साथ बैठने के लिए जलता है।

    उसमें समर्पण इसलिए हैक्योंकि वह स्वयं को मिटाकरदूसरे को जगह देती है।और विवशता इसलिएक्योंकि जो भीतर उमड़ता हैउसे रोका नहीं जा सकता।

    अगर कविता न होती,तो शायद हम भी न होते —इतने सच्चे,इतने नग्न,इतने मानवीय।

    कविता का होनाईश्वर का धीरे सेहमें छू लेना है।

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